पर्यावलोकन

भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की स्थापना 2 अप्रैल 1990 को संसद के एक अधिनियम के तहत, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र के संवर्द्धन, वित्तपोषण और विकास के लिए एवं साथ ही इसी तरह की गतिविधियों में संलग्न संस्थाओं के कार्यों का समन्वय करने हेतु प्रमुख वित्तीय संस्था के रूप में की गई।

सिडबी के व्यवसाय का केंद्रित कार्यक्षेत्र एमएसएमई है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। इस क्षेत्र ने वित्तवर्ष 2014-15 में देश के कुल योजित सकल मूल्य (जीवीए) में 33% तक का योगदान दिया है। साथ ही, इस क्षेत्र के 5.1 करोड़ उद्यम 11॰7 करोड़ भारतीयों को रोज़गार प्रदान करते हैं। वर्षों से, सिडबी पारिस्थितिकीय संपदा का संरक्षण करते हुए, एमएसएमई क्षेत्र के दीर्घकालीन विकास के लिए कार्य कर रहा है, और इसके अग्रणी प्रयास आर्थिक संपदा के सृजन के रूप में फलीभूत हुए हैं, और यह समतामूलक समाज के निर्माण के लिए उसका वितरण कर रहा है। इन प्रयासों में अभिनव क्रेडिट प्लस मॉडल शामिल है, जिसमें ऋण के साथ-साथ एमएसएमई को परामर्श और प्रतिपालक की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। सिडबी के कुछ अन्य क्रांतिकारी अभिनव प्रयासों में भारत में अल्प वित्त संस्थाओं के नेतृत्व में संचालित अल्पवित्त (माइक्रो फाइनेंस) अभियान, जिसके तहत 100 से अधिक अल्पवित्त संस्थाओं को पोषित एवं विकसित कर सुदृढ़ बनाया गया है और फलस्वरूप लघु वित्त बैंकों का निर्माण सुकर हुआ, एमएसएमई क्षेत्र के लिए ऊर्जा-दक्ष और दीर्घकालीन वित्तपोषण की संस्कृति का आरंभ और उद्यम पूँजी, जोखिम पूँजी, प्रतिलोम (रिवर्स) फैक्टरिंग और अन्य नवीन सुविधाओं की शुरूआत शामिल हैं, जिन्हें बाद में देश की विभिन्न सार्वजनिक और निजी संस्थाओं ने अपनाया है।


संख्यात्मक रूप से लगातार बढ़ रही एमएसएमई इकाइयों की वित्तीय और गैर-वित्तीय बाधाओं को हल करने की दिशा में अब सिडबी ने एक प्रेरित और केंद्रित दृष्टिकोण के साथ श्रृंखलाबद्ध संरचनात्मक प्रयासों और रणनीतिक हस्तक्षेपों की एक शृंखला चलाई है, जिससे एमएसएमई क्षेत्र को सशक्त और ऊर्जावान क्षेत्र बनाने में मदद मिलेगी।